मंगलवार, अप्रैल 19, 2011

ज़माने गुजर गए.

जब वो मेरे करीब से हंसकर गुजर गए,
कुछ खास दोस्तों के भी चेहरे उतर गए. 

वो हंस दिए तो रात संवारती चली गयी,
जुल्फें बिखेर दीं तो उजाले निखर गए.

अफ़सोस डूबने की तमन्ना ही रह गई,
तूफ़ान जिंदगी में आये गुजर गए.

कोई हमें बताये हम क्या जवाब दें,
मंजिल ये पूछती है की साथी किधर गए.

हालाँकि उनको देख के पलटी ही थी नजर,
अफ़सोस ये हुआ कि ज़माने गुजर गए.

रविवार, अप्रैल 10, 2011

हमारी धडकनों को उसने कितने काम सौंपे हैं..

बनाई सृष्टी ईश्वर ने तो कितना ध्यान रक्खा था,
की हर शै में कोई सपना कोई अरमान रक्खा था.
मुहब्बत नाम से चेहरा कोई वो दे नहीं पाया,
तो उसने प्यार का उनवान ही इन्सान रक्खा था
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धरा पर उस बड़े फनकार की कारीगरी हम हैं,
ये दुनिया है विधाता की तो इसकी जिंदगी हम हैं.
दिया उसने जो हमको और किसके पास है बोलो,
की उस शायर की सबसे खूबसूरत शायरी हम हैं.
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हमारी जिन्दगी को उसने सुबहो शाम सौंपे हैं,
हमारी जिन्दगी को प्यार के पैगाम सौंपे हैं.
दया, करुणा, मुहब्बत एक दूजे के लिए मिटना, 
हमारी धडकनों को उसने कितने काम सौंपे हैं..
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यहाँ पर, क्या यहाँ पर, राम या रहमान रहते हैं?
इसी धरती पे क्या मालिक तेरे अरमान रहते हैं?
यहाँ पर हर तरफ शैतान का साम्राज्य फैला है,
यहाँ क्या वाकई में रब तेरे इन्सान रहते हैं.. 

सोमवार, मार्च 28, 2011

मुहब्बत कौन करता है...


कवयित्री डॉक्टर कविता किरण जी की ये लाइने  मुझे बेहद पसंद हैं...


इबादत कौन करता है इनायत कौन करता है,
सभी हैं लूटनेवाले हिफाज़त कौन करता है,
भ्रमर की गुनगुनाहट से ही अब हर फूल डरता है.
सभी खिलवाड़ करते हैं मुहब्बत कौन करता है
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मेरी ख़ामोशी को इज़हार समझ बैठे हैं,
मेरे इन्कार को इकरार समझ बैठे हैं,
हंसके दो बात 'किरण' हमने उनसे क्या कर ली,
बस इसी बात को वो प्यार समझ बैठे हैं
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कलम अपनी,जुबां अपनी कहन अपनी ही रखतीहूँ,
अंधेरों से नहीं डरती 'किरण' हूँ खुद चमकती हूँ,
ज़माना कागजी फूलों पे अपनी जां छिड़कता है
मगर मैं हूँ की बस अपनी ही खुशबू से महकती हूँ

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ज़रा पाने की चाहत में जियादा छूट जाता है
जो कतरे को मनाती हूँ समंदर रूठ जाता है
कभी भी भूलकर मत आज़माना तुम 'किरण दिल को
ज़रा-सी ठेस लगने से ये शीशा टूट जाता है
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सूर्य ने जुगनुओं को पाला है,
क्या हुआ दिल किसी का काला है
नाम मेरा 'किरण' है ऐ साहिब!
मेरे अंदर मेरा उजाला है
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आइना रोज़ संवरता कब है
अक्स पानी पे ठहरता कब है
हमसे कायम ये भरम है वरना
चाँद धरती पे उतरता कब है
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दिल में उमीदें जगाओ तो सही
ख्वाब पलकों पे सजाओ तो सही
इतना भी ऊँचा नहीं है आस्मां
तुम परों को आजमाओ तो सही 

शनिवार, मार्च 19, 2011

होली का मौसम आता है...


कुछ रंग भरा ,कुछ भंग भरा,
होली का मौसम आता है
कुछ जीजा का, कुछ साली का,
होली में मौसम आता है.
देवर-भाभी के रिश्ते पर 
तो रंग और चढ़ जाता है,
उनकी ठिठोलियाँ देख देख,
पति मन ही मन झल्लाता है.
सजनी की भींज गयी चोली,
सजन की मस्त निगाहों से,
रंग पिचकारी बेकार लगे,
जब होली का दिन आता है
बाबा,देवर से लगते हैं,
होली के देखो तो तेवर.
बुड्ढों के गलों पर भी जब,
होली में दम ख़म  आता है.
साली-जीजा,भाभी-देवर,
सजनी-साजन हैं मस्त  आज
बाबा, देवर से कूद रहे,
होली में यौवन आता है..
आप सभी मित्रों को होली की शुभकामनाएं...
      - अतुल 

गुरुवार, मार्च 03, 2011

पूछकर उन्हें पैदा करना

जिन्दगी और जमाने की कशमकश से

घबरा कर मेरे लड़के मुझसे पूछते हैं,
"हमें पैदा क्यों किया था?"
और मेरे पास इसके सिवा
कोई जवाब नहीं है
कि मेरे बाप ने भी मुझसे बिना पूछे
मुझे पैदा किया था,
और मेरे बाप से बिना पूछे उनके बाप ने, उन्हें
और मेरे बाबा से बिना पूछे उनके बाप ने, उन्हें...
जिन्दगी और जमाने की कशमकश
पहले भी थी,
अब भी है, शायद ज़्यादा,
आगे भी होगी, शायद और भी ज़्यादा।
तुम्हीं नई लीक धरना
अपने बेटों से पूछकर उन्हें पैदा करना॥    
                                                           - डॉ. हरिवंश राय बच्चन की कविता ‘नई लीक’

मंगलवार, मार्च 01, 2011

ऐ! खूबसूरत स्त्रियों...

 ऐ! खूबसूरत स्त्रियों 
तुम मुझे माफ़ कर देना....
हम तुम्हारे वक्ष और कटि पर 
तुम्हारी तारीफ़ में 
कविता न लिख पाएंगे...
और हाँ- हमारी कविता में 
न तो रात के चाँद का जिक्र होगा 
और न ही कोई सवेरे वाला 
चिड़ियों का गीत होगा.....
फूल-पत्ती/ पहाड़-हवा 
सूरज- नदी 
किसी का भी खूबसूरती पर 
न होगा एक शब्द भी ..
दोस्त! मेरी मजबूरी समझो ...
अपने पति की याद में 
सती होती औरतों की तरह 
मेरी कविता पूर्ण नंगी 
जन्म से मौत तक 
समर्पित है 
भूख से तड़पते हुए लोगों पर .....
जिनके पेट से छाती तक 
इस कदर चिपटी- कि
देखने वाले कुछ और ही अर्थ 
निकालते हैं उम्र भर 
तुम्ही बताओ - फिर भला 
किसी और के जिक्र तक क़ी
गुंजाइश कहाँ बचती................
 - अतुल 

जब मैं नेता बन जाऊंगा...

बलात्कार सिर्फ मेरे जैसे 
वीर पुरुषों के लिए 
करने की चीज है ,
मै तुम्हारे जैसा- कायर नहीं 
की कानून से डरूं 
संविधान से घबराऊँ 
वर्दियों में कसे 
सरकारी गुंडे देखकर 
भाग जाऊं...
मैं तुम्हें चुनौती देता हूँ -कि
तुम अपनी बहन बेटी की
हिफाजत 
जितनी कर सको करना 
मैं तुम्हारे घर आऊंगा 
लेकिन- आज नहीं कल 
जब मैं नेता बन जाऊंगा....
      जब मैं नेता बन जाऊंगा ...

रविवार, फ़रवरी 27, 2011

कोई दीवाना कहता है.. सच ही तो कहता है


युवा कवि और आज के श्रेष्ठ गीतकार कुमार विश्वाश की ये रचना मुझे बेहद पसंद आई... 
कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है !
मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है !!
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ , तू मुझसे दूर कैसी है !
ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है !!

मोहब्बत एक अहसासों की पावन सी कहानी है !
कभी कबिरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी है !!
यहाँ सब लोग कहते हैं, मेरी आंखों में आँसू हैं !
जो तू समझे तो मोती है, जो ना समझे तो पानी है !!

समंदर पीर का अन्दर है, लेकिन रो नही सकता !
यह आँसू प्यार का मोती है, इसको खो नही सकता !!
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना, मगर सुन ले !
जो मेरा हो नही पाया, वो तेरा हो नही सकता !!

भ्रमर कोई कुमुदुनी पर मचल बैठा तो हंगामा!
हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा!!
अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा मोहब्बत का!
मैं किस्से को हकीक़त में बदल बैठा तो हंगामा!!

सोमवार, फ़रवरी 21, 2011

दुआ करता हूँ ...

अंतरिक्ष के गहरे समन्दरों में 
यदि कही कोई है द्वीप 
जहाँ कोई सांस ले रहा है 
जहाँ कोई दिल धड़क रहा है 
जहाँ बुद्धिमत्ता ने पी लिया है ज्ञान का घूँट 
जहाँ के लोग 
अंतरिक्ष के गहरे समन्दरों में 
किसी द्वीप की तलाश में उतर दे जहाज...
जहाँ कोई सांस ले रहा है 
जहाँ कोई दिल धड़क रहा है...
दुआ करता हूँ 
कि उस द्वीप के बासिंदों का रंग 
इस द्वीप पर रहने वाले 
सभी जिस्मो से भिन्न हो 
रूप भी भिन्न हो और अलग हो शक्लोसूरत भी 
दुआ करता हूँ ...
यदि उनका भी है कोई मजहब 
तो इस द्वीप के मजहबों से भिन्न हो 
दुआ करता हूँ.. उनकी जुबान भी 
इस द्वीप कि सब जुबानो से भिन्न हो 
दुआ करता हूँ अंतरिक्ष के गहरे समन्दरों से 
गुजर के इक दिन 
उस अजनबी नस्ल वाले लोग 
अंतरिक्ष के जहाजों में सवार होकर 
इस द्वीप तक आयें, 
हम उनके मेजबाँ हों 
हम उन्हें हैरत से देखें 
तभी, ...वो पास आकर हमें इशारों से ये बताएं 
कि उनसे हम इतने अलग हैं कि उनको लगता है 
इस द्वीप के रहने वाले सब एक से हैं,...
दुआ करता हूँ कि 
इस द्वीप के रहने वाले लोग 
उस अजनबी नस्ल के कहे का यकीन कर लें.. .
दुआ करता हूँ.....!

बुधवार, फ़रवरी 16, 2011

चटकते सम्बन्ध दरकता विश्वाश


चटकते सम्बन्ध
दरकता विश्वाश
आदमी से ही आदमी निराश
गुंडों के शरीर
झूलती खद्दर
इंसानियत नंगी चौराहे पर आज
अच्छे लोग घाट लग गए
बुरे दिल्ली पहुँच गए
भगवान् के आगे खुद को
अवतार बता रहे हैं
कुछ धार्मिक लोग
गुरु ही लूटने लगे हैं अस्मत हर रोज़
मेरी समझ में नहीं आता
इनकी मंशा क्या है
ये चाहते क्या हैं दोस्त
ये चाहते क्या हैं...